लेखनी प्रतियोगिता -10-Jan-2024 गुमनाम योद्धा
शीर्षक = गुमनाम योद्धा
भारत जिस पर कभी अंग्रेजी हुकूमत हुआ करती थी अंग्रेज़ों के जुल्मो सितम का शिकार हुआ करता था लेकिन फिर देश में आजादी की लहर टूट पड़ी अंग्रेज़ों के जुल्मो सितम का घड़ा भर चुका था और अब लाचार और परेशान हिन्दुस्तानियों ने उनके जुल्मो सितम का मुँह तोड़ जवाब देने की ठान ली थी भले ही काफ़ी साल लग गए इस चिंगारी को आग बनने में लेकिन हर एक कोशिश कामयाबी में बदल गयी ज़ब हजारों लोगो के बलिदान और त्याग के बाद भारत देश अंग्रेज़ों के जुल्मो सितम से आजाद हुआ और वो दिन था 15 अगस्त 1947 का ज़ब भारत पूर्ण रूप से आजाद हो गया था
आजदी के दौरान अनगिनत लोग शहीद हुए जिनमे से बहुत से लोग तो याद रखे गए लेकिन बहुत सो के बलिदानों को वक़्त की धूल ने धुंधला कर दिया
आजादी की चिंगारी को ज्वाला बनाने में सिर्फ ऊँचे दर्जे पर काम कर रहे लोगो का हाथ नही था बल्कि हर उस इंसान का हाथ था जो मशाल को थामे हुए थे या फिर कही न कही अपना छोटा मोटा योगदान दे रहे थे अंग्रेज़ों द्वारा प्रताड़ित करने के बावज़ूद भी
आज का दौर तो आधुनिक बहुत ज्यादा आधुनिक हो गया है, समुन्द्र पार की खबर भी इस तरह मिल जाती है मानो पड़ोस में ही कुछ हुआ हो लेकिन जिस समय भारत देश अंग्रेज़ों का गुलाम था उस समय इतना आधुनिक नही था एक जगह से दूसरी जगह खबर पहुंचाने के लिए भी हफ्तों महीने लग जाते थे
कहा अंग्रेज़ों का जुल्म हो रहा है और कहा उनका विद्रोह इस बात की खबर भी काफ़ी दिनों में लगती थी लेकिन फिर भी हमारे भारत देश को आजाद कराने के लिए ऐसे बहुत से योद्धाओ ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जो कि आज कि तारीख़ में गुमनाम है जबकी उनका एक महत्व पूर्ण रोल था आजादी की लड़ाई में क्यूंकि कहा कौन सी गतिविधि चल रही है, दिल्ली में क्या हो रहा है तो कोलकाता में क्या हाल चाल है इस बात की खबर जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को पंहुचाते थे उन्ही में से एक गुमनाम योद्धा के बारे में हम आज जानेंगे कि वो किस तरह अंग्रेज़ों से बच बचा कर खबर एक जगह से दूसरी जगह पंहुचाते थे
देश की आजादी के लिए अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में अनगिनत लोगों ने बलिदान दिया। इनमें से कई ने भारत को अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से मुक्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वहीं, स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे भी सेनानी शामिल थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गोपनीय तरीके से संदेशवाहक का काम किया और मां भारती की सेवा में खुद का जीवन लगा दिया। ऐसे लोग स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ का संदेश गांव- गांव तक पहुंचाते थे। ऐसे ही लोगों में रोह के काशी लाल का भी नाम शुमार है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ बढ़-चढ़कर काम किया।
उस वक्त एक दौर था जब स्वाधीनता आंदोलन के अग्रणी नेताओं महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू आदि का संदेश पत्र के माध्यम से आता था। जिसे बड़े गोपनीय तरीके से लेकर काशी लाल गांवों में जाते थे। जहां आजादी के दीवानों को संदेश पढ़कर सुनाते थे। संदेश कैथी लिपि में लिखी होती थी। जिसे प्लास्टिक में लपेटकर सुरक्षित पहुंचाया जाता था। इसके लिए गोधूलि बेला में लालटेन उपयोग किया जाता था। उस दौर में लालटेन के तेल की टंकी के ढाई- तीन इंच का किनारा होता था। टंकी के निचले हिस्से में प्लास्टिक में लपेटा हुआ पत्र रखकर ऊपर से मिट्टी लगा दिया जाता था। और फिर शाम होते-होते लालटेन लेकर काशी लाल गंतव्य को रवाना हो जाते थे। इस दौरान अगर अंग्रेजी सरकार से जुड़े लोग पूछताछ करते तो उन्हें कहते कि मैं पेशे से हलवाई हूं। फलां गांव में मिठाई का बकाया मांगने जा रहा हूं। पहचान छिपा कर रखने के कारण वह कभी अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आये लेकिन धर पकड़ का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता था। ऐसे सारे खतरों से परे काशी लाल अपनी धुन में माँ भारती की सेवा में सदैव तत्पर रहे।
काशी लाल गांव में नाटक में भी भाग लिया करते थे। उन्हें उनके रंग,रूप, कद के मुताबिक भगवान शंकर का रोल अदा करने को मिलताथा। इस नाटक के बहाने भी वे गांवों में जाकर लोगों को स्वाधीनता आंदोलन के अग्रणी नेताओं का संदेश सुनाते थे और ग्रामीणों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करते थे।स्वतंत्रता संग्राम में संदेशवाहक के रूप में उन्होंने काम कर देश को आजाद कराने में अपनी महती भूमिका निभाई। मगर जब भारत आजाद हुआ तो काशी लाल ने किसी भी तरह के सम्मान लेने से यह कहकर इनकार कर दिया कि अपनी धरती को आजाद कराना हमारा कर्तव्य था। मैंने किसी दूसरे पर कोई एहसान नहीं किया है। बल्किअपने वतन को फिरंगियों से मुक्त कराया है। इसके लिए मैं किसीप्रकार का सम्मान नहीं लूंगा। हालांकि आजादी के वक्त तक काशीलाल गृहस्थ जीवन से संन्यास भी ले चुके थे। इसलिए उन्हें सांसारिक मोहमाया से कोई वास्ता नहीं रह गया था। बाद में उनकी प्रेरणा से प्रेरित उनके एकमात्र पुत्र गोपाल शरण और पुत्रवधू विमला देवी ने प्रधानाध्यापक पद पर कार्यरत रहते हुए सामाजिक वर्जनाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी और नारी शिक्षा की अलख जगाते हुए समाज को अभिनव दिशा दी। वर्तमान में काशी लाल के पौत्र और उनके सभी परिजन समाज के लिए समर्पित हैं।
हमें आजादी दिलाने के लिए न जाने कितने ही काशी लाल जी जैसे गुमनाम योद्धाओ ने बिना अपने किसी निजी स्वार्थ के अपनी जाने हम पर कुर्बान कर दी ऐसे सभी गुमनाम योद्धाओ को हमारा शत शत नमन जिनके बलिदानों से ही आज हम सब आजाद हो पाए
समाप्त....
प्रतियोगिता हेतु.....
Alka jain
17-Jan-2024 07:08 PM
Nice
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Varsha_Upadhyay
14-Jan-2024 12:39 PM
Nice
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Gunjan Kamal
13-Jan-2024 04:17 PM
👏👌
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